[ अथ श्री नरसिंह चालीसा ] मास वैशाख कृतिका युत हरण मही को भार । शुक्ल चतुर्दशी सोम दिन लियो नरसिंह अवतार ।। धन्य तुम्हारो सिंह तनु, धन्य तुम्हारो नाम । तुमरे सुमरन से प्रभु , पूरन हो सब काम ।। नरसिंह देव में सुमरों तोहि , धन बल विद्या दान दे मोहि ।।1।। जय जय नरसिंह कृपाला करो सदा भक्तन प्रतिपाला ।।२ ।। विष्णु के अवतार दयाला महाकाल कालन को काला ।।३ ।। नाम अनेक तुम्हारो बखानो अल्प बुद्धि में ना कछु जानों ।।४।। हिरणाकुश नृप अति अभिमानी तेहि के भार मही अकुलानी ।।५।। हिरणाकुश कयाधू के जाये नाम भक्त प्रहलाद कहाये ।।६।। भक्त बना बिष्णु को दासा पिता कियो मारन परसाया ।।७।। अस्त्र-शस्त्र मारे भुज दण्डा अग्निदाह कियो प्रचंडा ।।८।। भक्त हेतु तुम लियो अवतारा दुष्ट-दलन हरण महिभारा ।।९।। तुम भक्तन के भक्त तुम्हारे प्रह्लाद के प्राण पियारे ।।१०।। प्रगट भये फाड़कर तुम खम्भा देख दुष्ट-दल भये अचंभा ।।११।। खड्ग ...
वो सिसकती मेरे फोन आने पर, सोचता था वो रोती है, मेरे प्यार को अनजान था, मैं नासमझ था, दिखावा था उसका सिसकना फोन पर अरसा बीता बात हुए, रात को दिन हुए, प्यार का दिवाला हुए उसको तो आदत थी धोखा देने की , बात ये अब आम हुई रोता यहां में उसकी चाहत को , गम था हम एक न हुए ये सोचता में परेशान था, उसको तो आदत थी बोलने की झूट ये कोशिश तो पूरी करती वो मुझे झुठलाने की ,बहाना तो शक था पूरी रात बिताने की , उसको तो आदत सी थी पूरी रात बिताने की मेरा तो सच्चा था प्यार, उम्मीद से बढ़कर उसे चाहने की ख्वाहिश अफसोस तो बहुत है उस कमबख्त को चाहने की । अशोक त्रिवेदिअनु
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