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kedarnath temple uttrakhand  india left hand mehandi indian style 18+ Marigold Flower   Mandakini River (kedarnath) Red flower full moon evening-A.P Purple Flower phto by-A.P Mustard (Sarson) flower  (Brassica- Scientific name ) Photo By-A.P water dropping-A.P

गढ़वाली साहित्य

गढ़वाली साहित्य की रोचक जानकारी  गढ़वाली साहित्य- गढ़वाली साहित्य में प्रायः दो ही लिंग होते है ------ पुल्लिंग ऊकारांत होते हैं जैसे -पुरणु ,उन्दू,ढिमकू,चोंसु, चोमासु आदि स्त्रीलिंग प्रायः  ईकारांत , अकारान्त और ऊकारांत होते हैं जैंसे - काखड़ी ,मुंगरी आदि साहित्य प्रेमी अशोक त्रिवेदी   मैं हर बार-त्यौहार मैं स्वाला-पक्वाड़ा बनाना संस्कृति का एक हिस्सा है , और जिन लोगों के यंहा नही पाता (जिनका सूतक के चलते ) उनको भी बनाकर दिया जाता है I प्रसाद की बात करें तो ज्यादातर रोट, हलवा,गुल्थ्या ,गुलगुला ,चूरण प्रसाद (आटे को भूनकर उसमें चीनी मिककर  बनाया जाने वाला चूरन ) रिवाज़ मेरे गढ़वाल दिवाली मैं --तिल के तिल-छटो की रात्रि के समय घर के पास सभी लोग मिलकर पहले पूजा करते हैं ,तत्पश्चात उनकी मशाल(भेलों)  को सिर के उपर घड़ी की दिशा मैं घुमातें हैं I महिला मंगलदल / पंचायत  जिस तरह आज देश की संसद मैं हो हंगामा होता है वो कंही और से नहीं बल्कि हमारे गांवों की पंचायत की देंन  है , क्योंकि मैंने गाँव की पंचायत देखि हैं ,...

फ्रेंडशिप

A short story -friendship by ashok trivedi https://kundaliya.blogspot.in               फ्रेंडशिप   दोस्ती दिल से होती है l किन्तु कुछ इस नाजुक दिल से खेलने वाले, जो खुद को इस खेल का माहिर खिलाडी समझते हैं; उनका भी इन्साफ होता है, और इसी दुनिया मैं रहकर कोई परलोक मैं नहीं l ``किसी के जज्बातों से मत खेलो किसी को कुछ देना चाहो तो रिस्पेक्ट दो ख़ुशी दो आप खुद को अंदर से गौरवान्वित महसूस करेंगे``!   अशोक त्रिवेदी , पहाड़ शब्द सुनते ही अक्सर सबके मन मैं एक अलग सी धारणा आ जाती है l पहाड़ मै अनेकों मुशीबतें हैं, किन्तु पहाड़ी जीवन शैली जितनी कठिन प्रतीत होती है, उतनी ही मधुर भी है l एक बार अवश्य मेरे  पहाड़ो (उत्तराखंड) मैं आकर देखिये आप अपने दुःख बीमारियों को हमेशा के लिए भूल जायेंगे खुद को तरोताजा महसूस करोगे और इस कुदरत (प्रकृति) को करीब से समझ सकोगे l बांज बुरांस की जड़ो का ठंडा पानी आपको तृप्त कर देगा , सांस लोगे तो आपका दिल भी इस हवा का दीवाना हो जायेगा l जब आप खाना...

तृष्णा (अशोक त्रिवेदी)

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तृष्णा एक छोटी सी चिड़िया उड़ती दूर-दूर ,कभी पूरब-पच्छिम कभी उत्तर-दक्षिण सुबह से  लेके शाम तक पंखो को फैलाये उड़ती दूर गगन के छोर तक कभी झुण्ड मैं चहचहाती,सरोवर मैं ये नहलाती दूर-दूर उड़ती रहती तृण-तृण ये संचित करती एक छोटी सी चिड़िया उड़ती दूर-दूर ,कभी पूरब-पच्छिम कभी उत्तर-दक्षिण सुबह से  लेके शाम तक पंखो को फैलाये उड़ती दूर गगन के छोर तक डाल-डाल पे चहचहाती कितना सुन्दर गीत ये गाती इनकी बोली इनकी भाषा काश कभी हमको समझ आती   एक छोटी सी चिड़िया उड़ती दूर-दूर ,कभी पूरब-पच्छिम कभी उत्तर-दक्षिण सुबह से  लेके शाम तक पंखो को फैलाये उड़ती दूर गगन के छोर तक सर्दी हो या गर्मी हो अंधड़ हो या आंधी  हो कितने दुःख ये सहती है लेकिन फिर भी चुप ये रहती है ,लेकिन फिर भी चुप ये रहती है अशोक त्रिवेदी     

तरुणा -हिंदी कहानी

तरुणा मेरी एक और कहानी है, जिसका लेखन कार्य  कुछ ही दिनों मैं संपन हो जायेगा ! धन्यवाद आपका प्यार और सहयोग मुझ पर बना रहे ....अशोक त्रिवेदी 

दया धर्म

सुदूर पहाड़ की ढलान पर कुछ सीढ़ी नुमा खेतो की आकृति मानो ऐंसी प्रतीत हो रही है जैंसे हज़ारों इंसान पंक्तिबद्द् बैठें हो ।   ये कोई परिकल्पना मात्र नहीं ये सच्चाई है मेरे पहाड़ की सुंदरता की, जंहा जल,जंगल,पशु-पक्षी  इसकी खूबसूरती मैं चार चाँद लगा देते हैं  । जंहा बेलों की जोड़ी (हीरा-मोती) के गले मैं बधीं घंटियों की टन-टन की मधुर ध्वनि अतिकर्णप्रिय लगती है ।   हम सभी का अपनी इस मिट्टी से माँ और बेटे का रिश्ता है । क्या आप अब भी नींद से नही जागे, उठो जागो नींद से अब समय आ गया है ।   समय कोन सा समय ? क्या ज्ञात है आप लोगों को कोन सा समय आ गया है ; कुछ मुर्ख और कुछ विद्धवान ये सवाल अवश्य ही करेंगे ,की मैं किस अमूल्य समय की बात कर रहा हूँ । जी हाँ कुछ महाशय ये जानते हैं ; मैं पहाड़ बचाओ अभियान की बात कर रहा हूँ ;जीहां सही पढ़ा आप लोगों ने  | अगर आज पहाड़ो को ना बचाया गया तो आने वाली पीढ़ी तरस जायेगी एक घूँट पानी को, तड़प जायेगी ऑक्सीजन की एक सांस को;  तब निर्वस्त्र पहाड़ लाचार और बेवस होंगे | ना तो हवा होगी सांस लेने को ; न पीने को पानी।   ...

मेरे पहाड़ी और पहाड़

भारतवर्ष मैं उत्तराखंड एक पहाड़ी राज्य है । जो हिमालय की गौद मैं बसा है । यंहा के लोग बड़े ही भोले-भाले स्वभाव के होते हैं ।      यंहा की अपणी एक लोक सभ्यता है । हम पहाड़ी लोग साधारण तरीके से अपना जीवन यापन करते हैं ।   उत्तराखंड की स्थापना 9 नवम्बर 2000 को हुई ,पहले हम उत्तरप्रदेश मैं आते थे । जो काफी संघर्ष करने बाद एक पृथक राज्य बना । जिसके लिए कई लोग शहीद हो गए (माताओ ने अपने बेटे खोये,बहनों ने भाई, कई माताये भी शहीद हुई ! शासन ने उस समय इतनी निरंकुशता की आह ! ऐसी बर्बरता को कौन भुला सकता है । दिल काँप उठता है उस बात को याद करके ,मैं बहुत छोटा बच्चा था तब लेकिन अखबारों की वो लाइन आज तक मेरे जेहन मैं हैं )                           यंहा कुमाऊं और गढ़वाल को मिला कर 13 जिले है । है यंहा की पहाड़ी भाषाएँ गढ़वाली,कुमाउनी,जौनसारी मुख्य रूप से बोली जाने वाली भाषाये हैं ।    आप लोगों ने यदि यंहा के लोक गीतों को सुना होगा तो आप ...