सुदूर पहाड़ की ढलान पर कुछ सीढ़ी नुमा खेतो की आकृति मानो ऐंसी प्रतीत हो रही है जैंसे हज़ारों इंसान पंक्तिबद्द् बैठें हो । ये कोई परिकल्पना मात्र नहीं ये सच्चाई है मेरे पहाड़ की सुंदरता की, जंहा जल,जंगल,पशु-पक्षी इसकी खूबसूरती मैं चार चाँद लगा देते हैं । जंहा बेलों की जोड़ी (हीरा-मोती) के गले मैं बधीं घंटियों की टन-टन की मधुर ध्वनि अतिकर्णप्रिय लगती है । हम सभी का अपनी इस मिट्टी से माँ और बेटे का रिश्ता है । क्या आप अब भी नींद से नही जागे, उठो जागो नींद से अब समय आ गया है । समय कोन सा समय ? क्या ज्ञात है आप लोगों को कोन सा समय आ गया है ; कुछ मुर्ख और कुछ विद्धवान ये सवाल अवश्य ही करेंगे ,की मैं किस अमूल्य समय की बात कर रहा हूँ । जी हाँ कुछ महाशय ये जानते हैं ; मैं पहाड़ बचाओ अभियान की बात कर रहा हूँ ;जीहां सही पढ़ा आप लोगों ने | अगर आज पहाड़ो को ना बचाया गया तो आने वाली पीढ़ी तरस जायेगी एक घूँट पानी को, तड़प जायेगी ऑक्सीजन की एक सांस को; तब निर्वस्त्र पहाड़ लाचार और बेवस होंगे | ना तो हवा होगी सांस लेने को ; न पीने को पानी। ...