वो सिसकती मेरे फोन आने पर, सोचता था वो रोती है, मेरे प्यार को अनजान था, मैं नासमझ था, दिखावा था उसका सिसकना फोन पर अरसा बीता बात हुए, रात को दिन हुए, प्यार का दिवाला हुए उसको तो आदत थी धोखा देने की , बात ये अब आम हुई रोता यहां में उसकी चाहत को , गम था हम एक न हुए ये सोचता में परेशान था, उसको तो आदत थी बोलने की झूट ये कोशिश तो पूरी करती वो मुझे झुठलाने की ,बहाना तो शक था पूरी रात बिताने की , उसको तो आदत सी थी पूरी रात बिताने की मेरा तो सच्चा था प्यार, उम्मीद से बढ़कर उसे चाहने की ख्वाहिश अफसोस तो बहुत है उस कमबख्त को चाहने की । अशोक त्रिवेदिअनु
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